गुरुवार, 22 अगस्त 2013

नए अघात मत करना मुहोब्बत की सलाखों से





अगर दुखती रगों को तुम मेरी सहला नहीं सकती 
नए अघात मत करना मुहोब्बत की सलाखों से 
छुओ न तुम ह्रदय ज्वालामुखी सा सुप्त रहने दो 
कहीं फिर जाग ना जाए तुम्हारे नर्म हाथों से ||

सिवा दो चार छालों के नहीं कुछ इस हथेली पर 
खुदा की लेखनी ने भाग्य की रेखा नहीं खींची 
सम्हाला होश जबसे साथ, देखा था अकेलापन 
किसी ने प्यार की बरसात से क्यारी नहीं सींची ||

उजाला है मगर दिल में अमावास ही अमावास है 
मुहोब्बत हो गयी है अब अकेली शाम , रातों से ||

कभी भगवान् से मैंने कोई चाहत नहीं मांगी 
मुझे फिर भी बिना मांगे दुखों की पोटली दे दी 
छुपाकर कब तलक रखूँ हंसी झूटी दिखाकर के 
अगर हिम्मत करूँ भी तो तमन्ना खोखली दे दी ||

डराया है मुझे अक्सर मेरी परछाइयों ने ही 
मुझे फिर से डराओ मत सलीके दार बातों से ||


तुम्हारे प्रेम को स्वीकार करने पर यकीनन तुम 
नयी शुरुआत चाहोगी मेरे अवशेष जीवन से 
जला अंगार हूँ मै क्या पता कब राख हो जाऊं 
उड़ा ले कब मुझे बहती हवा सुनसान आँगन से ||

चली जाओ कहीं कोई तरुण सी छावं खोजो तुम 
पुराने खंडहर को मत गिराओ नर्म हाथों से 
अगर दुखती रगों को तुम मेरी सहला नहीं सकती 
नए अघात मत करना मुहोब्बत की सलाखों से ||

मनोज